
लॉक डाउन कोअधिकांश लोग मानसिक प्रताड़ना स्वीकार कर रहे है। जबकि इसका सकारात्मक पक्ष ,लॉक डाउन हमारे जीवन मे अवसर बन कर आया है।बहुत दिनों से हम मन मसोस कर रह जाते थे कि क्या करे इतने बिजी है कि अपने हावी ,रुचि के समय नही बचता है। इस काल मे हम अपने रुचि, प्रतिभा को विकसित कर सकते है।आज कोरोना कोविड 19 वायरस ने हमारे सामने ऐसी चुनौती लाया है कि इसकी कभी सपने में भी कल्पना नही किया था। यह समय अपने को समय के अनुकूल ढालने की शिक्षा देता है। क्योंकि इस प्रकार की प्राकृतिक ,बीमारी ,घरेलू समस्याये तो फिर स्वरूप बदल कर आयेगी। इसके लिये हम तैयार रहे। यह समय आपको एक महत्वपूर्ण शिक्षा दे दिया है कि आत्मनिर्भर होना ही सभी समस्याओं का हल है। इसलिये आत्मनिर्भर बनने के लिये चिंतन करे।
कोरोना वायरस को लेकर आज विश्व मे सभी डर का जीवन व्यतीत कर रहे है। आगे क्या होगा ? कही यह रोग हमें न लग जाये? इस तरह के अनेक नकारात्मक विचारों से जूझ रहे है। सभी को एकमात्र ईश्वर, आध्यात्म का सहारा दिख रहा है।इस नकारात्मक वातावरण से प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी के राजयोग ज्ञान द्वारा हम कोरोना कोविड19 से भी भयानक परिस्थिति का सामना कर सकते है। वास्तव में कोरोना कोविड 19 से भयंकर काल भविष्य में आएगा। यह भयावह स्थिति, प्राकृतिक आपदा ,महामारी अथवा हमारे जीवन की दुर्घटनाओं के रूप में हमारे सामने आ सकता है।प्रश्न है कि क्या हम आने वाली भयावह परिस्थितियों का सामना करने के लिये तैयार है।
राजयोग के निरंतर अभ्यास से अष्टशक्तियों की प्राप्ति होने लगती है ,अष्ट शक्ति -1 सहनशक्ति,2 परखने की शक्ति 3- निर्णय शक्ति 4- समेटने की शक्ति 5- विस्तार को संकीर्ण करने की शक्ति,6- सहयोग की शक्ति ,7-सामना करने की शक्ति, 8- समाने की शक्ति।

( पहली शक्ति ).सहनशक्ति :-सहनशक्ति को विकसित करने का आधार है प्रेम और क्षमा | कैसा भी विरोधी/दुष्ट/मतलबी/दुश्मन हो आपका विरोध करे आप उसके प्रति चुप रहे, वो बार-बार गाली दे,क्रोध करे,अपशब्द बोले फिरभी आप उस प्रति मीठे बोल ही निकालो उस प्रति सदा स्नेही,सदा मुस्कुराते हुए उसे मन से दुआये ही दे और उस प्रति शुभभावना रखे उससे बड़े प्यार से बाते करे उस प्रति सदैव रहमदिल ही रहे | वह आप पर झूठा इल्जाम लगाये पर आप उस प्रति सदैव स्नेही और रहमदिल बनो | जिस प्रकार फलों से लदा वृक्ष पर लोग बड़ी बह-रहमी से पत्थर मारते है किन्तु वो वृक्ष अपने सहनशील स्वभाव द्वारा सदैव उनको मीठे फल और छाया ही देता है | इसीप्रकार सदैव के लिए मन,वाणी व कर्म में सरल और सहनशील बनो ,मजबूरी से नहीं बल्कि प्रेम में सब कुछ सहन करते जाओ | चाहे पहाड़ जैसी समस्याएँ हो या कैसी भी बड़ी बात हो जावे आप उसे हल्का बना दो स्वयं भी हल्का रहे और दूसरों को भी हल्का रखे इसी को ही कहा जाता है –सहनशीलता | विस्तार को सार में लाना यह है –सहनशीलता | हर बात पर फुल-स्टाप लगाना,विस्तार को सार में ले आना ही सहनशीलता है।सहनशक्ति की विशेषताएँ :-(1).सहन शक्ति है, तो सर्व विघ्नों से बचे रहेंगे |(२) सहनशक्ति से हम अपने व्यर्थ संकल्पों को भी कंट्रोल कर सकते है |(3) बड़ी से बड़ी मुसीबत को झेलने की शक्ति की ताकत सहनशक्ति से आती है |(4) दूसरों को झुकाने अथवा दूसरों में सकारात्मक परिवर्तन लाने का आधार है –सहनशीलता (5) दुश्मन को भी दोस्त बनाने;क्रोधी को शांत करने;बड़ी बात को छोटी कर, फिर उस बात को खत्म करने ,समस्याओं को समाप्त करने में,दूसरों को आप समान गुणी बनाने में सहनशक्ति की आवश्कता होती है |
(6) सहनशक्ति से सर्वगुणों की प्राप्ति हो जाती है |(7) सहन शक्ति वाला किसी बात में घबराएगा नहीं ना ही हलचल में आयेगा,इस प्रकार वो हर बात पर अचल रहेगा और सदा ही मौज में रहेगा |

( दूसरी शक्ति ). परखने की शक्ति :-परिस्थिति को परखने के बाद ही परिणाम ठीक निकलता है | यदि चीजो को परखते नहीं है ,तब परिणाम उल्टा हो जाता है |
मन में व्यर्थ की सोच ना रहे सदैव शुभ/शुद्ध व समर्थ संकल्प (सोच विचार )मन में उत्पन्न हो | बुद्धि में किसी प्रकार का किचड़ा ना हो अथार्त बुद्धि में कोई व्यर्थ संकल्प-विकल्प ना चले | क्योकि जब मन में ज्यादा से ज्यादा संकल्प ( व्यर्थ व कमजोरी के सोच-विचार )चलते है तब बुद्धि इतने संकल्पों को पढ़ नहीं पायेगी यानि किसी के संकल्पों को परख नहीं सकती है | इसलिए परखने की शक्ति का आधार है बुद्धि का हर प्रकार से क्लीयर होना ।यानि व्यर्थ की ज्यादा बाते सोचने के बजाए एक परमात्मा की ही याद हो,एक परमात्मा के दिए दिव्य ज्ञान व दिव्य विचारों की खुराक बुद्धि को देते रहना | इस प्रकार बुद्धि की लाईन क्लीयर होगी तो परखने की शक्ति आ जायेगी | इसलिए बुद्धि हर प्रकार के व्यर्थ से मुक्त हो (इकनामी) तथा एक बाप परमात्मा दूसरा ना कोई (एकनामी )होना चाहिए |मन-बुद्धि की एकाग्रता ही परखने की शक्ति को बढाता है | इसलिए परमात्मा के साथ योगयुक्त बन परखने की शक्ति धारण करो |

( तीसरी शक्ति ) . निर्णय शक्ति :-जैसा समय ,वैसी बात और वैसा स्वरूप बनने के लिए निर्णय शक्ति चाहिए | जब हम पहले से ही जान लेंगे की कौन सा समय है और कौन सा स्वरूप उस प्रमाण होना चाहिए तब ही माया के वार से बच सकते है और विजयी बन सकते है | कौन से समय कौन सी शक्ति का प्रयोग करना है यह सही निर्णय ,निर्णय शक्ति पर ही निर्भर करता है |निर्णय शक्ति को विकसित करने में निम्नलिखित बातों को ध्यान दिया जाना चाहिए :-(क).निर्णय शक्ति को बढ़ाने के लिए जितना हो सके,डिटैच भाव से कर्म करे।(ख) निर्णय करना बुद्धि का काम है | निर्णय शक्ति को बढ़ाने के लिए बुद्धि की लगन वा बुद्धि में सच्चाई और सफाई का होना अति आवश्यक है क्योकि कोई भी चीज जितनी साफ़ होती है उतना ही उसमें सब स्पष्ट दिखाई देता है अथार्त निर्णय सहज हो जाता है |(ग) ज्यादा सोचना नहीं है ,सोचने से निर्णय शक्ति कम हो जाती है | अत:व्यर्थ संकल्पों में तुरंत स्टॉप लगाना चाहिए और व्यर्थ के प्रश्नों में आने से निर्णय शक्ति में कमी आती है | समर्थ संकल्प आध्यत्मिक संकल्प ,निर्विकल्प बुद्धि,क्लीयर बुद्धि,निर्णय शक्ति को बढाती है |(घ) ट्रस्टी भाव अथार्त मेरापन खत्म कर,यह मान लेना होगा कि मेरा कुछ नही है, सब परमात्मा का है | ट्रस्टी होकर हल्के हो जाओ तो निर्णय शक्ति श्रेष्ठ हो जायेगी |(च) जितनी मन-बुद्धि में शांति होगी उतनी सही निर्णय की शक्ति बढ़ती जायेगी |(छ) यर्थाथ निर्णय का आधार है –निश्चय बुद्धि और निश्चय स्थिति का होना | राजयोग के अभ्यास के द्वारा निर्णय शक्ति आ जाती है और विकसित होती जाती है ,जिसकी वजह से सही-गलत ,सत्य-असत्य ,सकारात्मक-नकारात्मक ,व्यर्थ-समर्थ की पहचान कर फिर सही निर्णय ले आगे प्रगति के मार्ग पर बढ़ता है |

(चौथी शक्ति ).समेटने की शक्ति :- यानि शार्ट करने की शक्ति | हर समय यह याद हो कि :-“ मैं कौन हूँ ? “मैं तो एक आत्मा हूँ “ यह देह भी मेरी नहीं;परमात्मा द्वारा दी गई है ; मैं तो इसकी सम्भाल करने मात्र ट्रस्टी हूँ | समेटने की शक्ति को बढ़ाने के जब स्वभाव सरल होगा है | सरल स्वभाव वाले के व्यर्थ संकल्प नहीं चलते है | उनका समय व्यर्थ नहीं जाता | व्यर्थ संकल्प ना चलने के कारण उनकी बुद्धि विशाल और दूरदर्शी रहती है | सभी व्यर्थ संकल्प बदलकर एक “मेरा बाबा(परमात्मा) “के संकल्प में टिक जाती है |

(पाँचवी शक्ति ).विस्तार को संकीर्ण करने की शक्ति :-जिस प्रकार एक कछुआ जब चाहे कर्म में आने के लिए अपने सख्त खोल में से अपने हाथ-पैर और मुख को बाहर निकालकर कर्म में आता है और आवश्कता ना होने पर वा किसी बाहरी आक्रमण से बचने के लिए वो अपनी सभी कर्म-इन्द्रियों को सिकोड़कर अपने मजबूत खोल सुरक्षित कर लेता है | उसी प्रकार राजयोगी भी स्वयं को सुरक्षित कर लेता है।
( छठी शक्ति ).सहयोग की शक्ति :- सभी जगह सर्व प्रति कल्याण की शुभ भावना ,शुभ कामना वा श्रेष्ठ भावना से तन-मन-धन द्वारा ईश्वरीय मर्यादा वा श्रीमत को ध्यान में रखकर सभी को निस्वार्थ भावना से पूरा-पूरा सहयोग देना है |सिर्फ संदेश देने के सहयोगी नहीं बनो अपने परिवर्तन से सहयोगी बनो | किसी को गुणों के दान द्वारा सहयोगी बनो | किसी को उमंग-उत्साह बढ़ाने के सहयोगी बनो |जो विशेषताएँ हो उनको भी दिए जाने वाले सहयोग के कार्य में लगाओ | इस प्रकार सर्व के सहयोगी बनना माना सहजयोगी बनना है |

( सातवीं शक्ति ).सामना करने की शक्ति :-सर्वप्रथम यह देखो कि किसका सामना करना है, माया का सामना करना है उसे हराना ही है वो भी सामना करने की शक्ति से | माया किसी भी रूप में आवे उसे परखने की शक्ति से परखकर ही उस ओर से किनारा कर अपने समय व शक्ति की बचत कर लो ,किन्तु यदि माया किसी रूप में आ ही जावे तो अंगद के समान अपनी अचल-अडोल स्थिति द्वारा उसका सामना कर जो बाप(परमात्मा ) ने हमे युक्तियां दी है उसको प्रेक्टिकल रूप में लाकर उसे हराना है | फिर निश्चयबुद्धि व अचल-अडोल स्थिति की विजय निश्चित ही है |
सामना करने में सबसे बड़ी बाधा है डर | डर तब लगता है जब यह अनुभव होता है की मेरा क्या होगा ? अपने को शरीर समझते हो और शरीर के भान में आते हो तो डर लगता है | अपनी मौत का डर सबसे बड़ा डर है – हाय ! यह मेरा तन |यदि आप देह के भान से परे जितना-जितना जाते जायेंगे और देही-अभिमानी स्थिति में स्थित होते जायेंगे ( यानि आत्मिक स्थिति में स्थित होते जायेंगे कि “ मैं यह शरीर नहीं इस शरीर में रहने वाली एक मैं एक अजर-अमर-अविनाशी ज्योतिर्बिंदु आत्मा हूँ “| इसका पूरा-पूरा प्रेक्टिकल रूप से अभ्यास हो | ) उतना डर दूर होता जाएगा |दूसरा है आप अपने को आत्मा समझ फिर परमात्मा से अपना दिव्य बुद्धि द्वारा योग लगाकर उस सर्व समर्थ परमात्मा को याद करो तो फिर आप में सर्व प्रकार का डर समाप्त होने लगता है और उस सर्व समर्थी परमात्मा से सामना करने की शक्ति स्वयं ही आ जाती है | इस प्रकार यदि अपने सामने किसी निकटतम सगे-सम्बन्धी की मृत्यु भी हो जावे या किसी प्रकार की सांसारिक समस्याएँ तूफ़ान का रूप सामने धारण कर ले तो भी कभी भी विचलित नहीं हो सकेंगे और फिर आत्मा रूपी दीपक सदा ही जलता रहता है तथा अन्य आत्माओं को ज्ञान-प्रकाश देता रहेगा |

( आठवीं शक्ति ). समाने की शक्ति :-मतलब दूसरों के साथ-साथ ख़ुशी-ख़ुशी एडजेस्ट करना |जब हम निरंतर परमात्मा से सहज राजयोग का अभ्यास करते है तब हमारे में समाने की शक्ति आने लगती है | हमारी मन में उठने वाली सोच सकारात्मक होती जाती है और बुद्धि विशाल हो जाती है कि हर बात चाहे वो दूसरों के द्वारा दुःख देने वाली हो या हमे परेशान करने वाली हो वो हम अपने दिल में लगाकर परेशान नहीं होते बल्कि अपने में समा जाते है जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं अपने चित पर रखकर परेशान नहीं होते बल्कि फिर भी सभी के प्रति सकारात्मकता ही बनी रहती है | फिर भी ऐसे नहीं समाना जो अपने में समा कर फिर बीमार पढ़ जावे और दिमाग खराब हो जाये ,बल्कि ऐसा समाना जो कोई बात चित्त पर ना जावे और कोई नकारत्मक असर भी ना पढ़े | इस समाने की शक्ति से प मर्यादा में रह और गम्भीरता के गुण के साथ-साथ दूसरों के गुणों को ही धारण करता है | उसके अवगुणों को वो किसी प्रकार देखता-सुनता ही नहीं है | यह सभी बाते ज्ञान व ईश्वर से निरंतर योग से ही आती है |राजयोग में स्वयं की चेकिंग पर बहुत बल दिया है। छिपाना ,बहाना बनाना।अपनी गलती को छिपाने के लिये बहुत बहाने बनाने में लग जाते है।अपनी गलती को गलती मानने की जगह झूठ को सही सिद्ध करने की ज़िद करने लगते है। काले कोट वाले ,वकीलों की तरह माया की वकालत में लग जाते हैसिद्ध करने वालो में जिद करने का संस्कार जरूर होते है। अपनी गलती को छिपाने के लिये कोटेशन देंगे,कहेंगे ,फला महारथी भी ऐसा करता था।समय -परिस्थिति को नही देखते है और शब्द पकड़ लेते है।होशियार वकील के साथ खुद जज भी बन जाते है।अपना पोजिशन लेने के कारण माया के ओपोजिशन में कमजोर पड़ जाते है। एक भूल के साथ अनेक भूल करते जाते है।अपने करेक्शन की जगह दुसरो का करेक्शन करते रहते है।राजयोग में साधनों पर निर्भरता कम करने पर बल दिया जाता है। आवश्यक साधन तो सभी के पास है,इसलियें चेक करे कि कहाँ पर आवश्यकता से अधिक साधन है।साधना से अपने साधनों को कम किया जा सकता है। दुसरो का दृष्टांत देकर ,इसे अपना सिद्धान्त बताकर ,फिर सिद्ध करते है और जिद करते है। होते हुए भी,इससे दूर रहना ,इसे ही वैराग्य वृति कहते है।साधनों के होते हुए भी साधनों से दूर रहना,वैराग्य वृति कहलाता है, होते हुए भी,दूर रहना ही असली वैराग्य है।यदि हमारे पास कुछ है ही नही,फिर हम कहे कि हमको तो वैराग्य है,हम तो है ही वैरागी, इसे वैराग्य नही कहा जा सकता है।अंत मे महत्वपूर्ण सन्देश-तीसरे चरण आने पूर्व अपने दोनों चरण घर मे रखे-लॉक डाउन, का पालन करे।
सहायक निदेशक सूचना , नोडल अधिकारी कुम्भ मेला 2021 एवंप्रभारी विधानसभा मीडिया सेंटर
