दी टॉप टेन न्यूज़
रचनात्मक शिक्षक मंडल रामनगर की पहल पर सामाजिक आर्थिक रूप से वंचित तबके के बच्चों के लिए सात दिवसीय पाठ्यक्रम निर्माण कार्यशाला कॉर्बेट पार्क से जुड़े ज्योतिबा फुले- सावित्रीबाई फुले सायंकालीन विद्यालय सांवल्दे में आरम्भ हुई।
रचना धर्मी शिक्षक नवेंदु मठपाल की पहल पर कार्यशाला का आगाज शिक्षक राज पांडे द्वारा यश मालवीय की कविता ‘दबे पैरों से उजाला आ रहा है’ और हरीश चंद्र हरिमन ने गिरीश तिवारी गिर्दा के गीत ‘उत्तराखंड मेरी मातृभूमि’ से हुईं तथा एनसीईआरटी पाठ्यक्रम निर्माण समिति से जुड़े दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर विकास गुप्ता, शिक्षा विभाग की प्रोफेसर राधिका मेनन के शुभकामना संदेशों के साथ तीन सत्रों में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने विद्यालय की पाठ्यचर्या की रूपरेखा पर विचार विमर्श किया। यह पाठ्यचर्या उन बच्चों के लिए विकसित की जा रही है जो आस पास के सरकारी विद्यालयों में नामांकित तो हैं या तो स्कूल नहीं जाते और परिवार द्वारा श्रम कार्यों से फुर्सत न मिलने के कारण पढ़ने लिखने की आदतें विकसित नहीं कर पाए। ज्यादातर बच्चे स्कूल छोड़ कर मजदूरी के कार्यों में संलग्न हो जाते हैं। सेवित क्षेत्र के इन्हीं बच्चों की शैक्षणिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर इस सायंकालीन विद्यालय की एक अनूठी अवधारणा विकसित हुई है।

कार्यशाला के दूसरे सत्र में आमंत्रित विशेषज्ञों द्वारा विद्यालय प्रबंधन को मजबूत करने के लिए सुझाव प्रस्तावित किए। इनमें से प्राथमिक स्तर पर ऐसी गतिविधियों को सम्मिलित करने पर आम राय बनी जिन्हें स्कूली पाठ्यक्रम में नजर अंदाज कर दिया जाता है। जैसे जंगल भ्रमण, वर्ड वाचिंग, एको टूरिज्म, मिट्टी, चट्टान और जीवों का अवलोकन, टिंबर, बागवानी, खेती किसानी, परिवेश में पैटर्न देखना, शिल्प, भवन निर्माण स्थानीय सांस्कृतिक तत्वों का अध्ययन रिवाज़ो, पर्व, खेल, त्योहारों का अध्ययन इत्यादि। पाठ्यचर्या निर्माण हेतु कुल 35 प्रस्तुतीकरण हुए। इन सुझावों में विश्लेषज्ञों ने एक बहु कक्षा में विषयों के समन्वित समावेश पर आधारित बहुस्तरीय पाठ्यचर्या निर्माण पर सहमति जताई। समावेशित अधिगम वाली इन सायंकालीन कक्षाओं का संचालन लचीला होगा जिसमें विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों के बीच अधिगम प्रक्रिया संपादित हो सकेगी। आम स्कूलों में जीवन कौशलों को सीखने में पीछे रह गए बच्चों को भी इस पाठ्यचर्या से मदद मिल पाएगी।
तीसरे सत्र में विभिन्न विषयों के शिक्षण के लिए अपनाई जाने वाली पद्धतियों पर चर्चा की गई ताकि शिक्षण उबाऊ न हो। स्थानीय संदर्भों को सम्मिलित करने सीखना मनोरंजक बन सकेगा। प्रकृति अध्ययन से वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास तथा स्थानीय भाषा का इस्तेमाल कर संपूर्ण गतिविधियों का संचालन किया जाएगा। क्योंकि परंपरागत पाठ्यक्रम बच्चों खुश नहीं रख पा रहे हैं, इस सायंकालीन विद्यालय के लिए पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत थी।
एससीईआरटी पाठ्यक्रम निर्माण समिति से जुड़े शिक्षाविद मदन मोहन पांडे की अध्यक्षता में हेमलता तिवारी, राष्ट्रीय कोच देवेंद्र भट्ट, गणितविद डॉ नरेंद्र सिजवाली, निर्मल न्योलिया, पक्षीविद राजेश भट्ट, जितेंद्र बिष्ट, डॉ महेश बवाड़ी, सी पी खाती, मुरलीधर कापड़ी, हेमंत कुमार, हरीश हरिमन्दा, भगवती प्रसाद पंत, प्रकाश चंद्र फूलोरिया, उमेश चंद्र तिवारी, वीरा अनंत, डॉक्टर साक्षी, अनिता चौहान, सोनी बिष्ट, नवेन्दु मठपाल, राजेंद्र पांडे, सुमित कुमार, शोभा न्योलिया, अंकित बेलबाल, सुजल कुमार, बाल कृष्ण चंद्र, लविश बेलवाल, रितु बेलवाल, वंदना तथा रिंकी द्वारा सायंकालीन विद्यालय हेतु पाठ्यचर्या निर्माण पर चर्चा सत्र में शामिल हुए।
अंतिम सत्र में इन सवालों पर गहन विचार विमर्श शुरू हुआ
कैसा स्कूल होगा यह? क्या यह सरकारी स्कूल के लिए सपोर्ट सिस्टम के रूप में कार्य करेगा? जब सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों की उपस्थिति नहीं हो पा रही है ऐसे में कैसे विद्यार्थियों को स्कूल तक लाया जा सकेगा? उन बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में कैसे सम्मिलित किया जाएगा पढ़ना ही नहीं चाहते?

स्कूल की कक्षाएं बंद होंगी कि खुली?
स्कूल दिनचर्या में वादन और घंटी का कोई प्रावधान होगा कि नहीं,
विषय क्या होंगे,
शिक्षक कौन होगा और कितने होंगे?
किन-किन संबंधों पर प्रतिदिन कक्षा शिक्षण होगा? सीखने सिखाने के तौर तरीके क्या होंगे?
विकसित कौशल उनके परिवेश के संसाधनों में उपलब्ध रोजगार से कैसे जुड़ेंगे? जिनका अभिलेखीकरण 6 जून तक पूर्ण होगा।
रिपोर्ट संकलन: निर्मल न्योलिया, खटीमा

