दी टॉप टेन न्यूज़
विशेष विज्ञान रिपोर्ट संकलन : निर्मल न्योलिया
उत्तराखंड की शांत पहाड़ियों में मई का महीना इस बार केवल मौसम के बदलाव का नहीं, बल्कि विज्ञान चेतना के एक असाधारण आंदोलन का साक्षी बना। देश के सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी, पद्मश्री शिक्षाविद एवं आई आई टी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर एच सी वर्मा ने 21 दिवसीय “उत्तराखंड विज्ञान यात्रा” के माध्यम से विज्ञान को किताबों से निकालकर बच्चों के हाथों, शिक्षकों के अनुभवों और समाज की चेतना तक पहुँचाने का अनूठा प्रयास किया।

“प्रयोग-यात्रा सरिता (प्रयास)” नामक यह अभियान केवल कार्यशालाओं की श्रृंखला नहीं था, बल्कि विज्ञान शिक्षा को जीवन, परिवेश और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने वाला एक सशक्त जनआंदोलन बनकर उभरा। विज्ञान जब कक्षा से निकलकर जीवन में उतरता है। आज की शिक्षा व्यवस्था में विज्ञान प्रायः सूत्रों, परिभाषाओं और परीक्षा आधारित तैयारी तक सीमित होकर रह गया है। ऐसे समय में डॉ. वर्मा ने यह संदेश दिया कि विज्ञान का वास्तविक अर्थ है — जिज्ञासा, प्रयोग और अनुभव।
यात्रा के दौरान आयोजित “परिवेशीय संसाधन आधारित अनुभवात्मक भौतिकी कार्यशालाओं” में 480 भौतिक विज्ञान शिक्षक, 208 शिक्षक प्रशिक्षक तथा 410 शिक्षक प्रशिक्षु सम्मिलित हुए। इन कार्यशालाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इनमें महंगे उपकरणों की जगह घर और आसपास उपलब्ध साधारण वस्तुओं से भौतिकी की जटिल अवधारणाओं को समझाया गया।

डेटॉल की खाली बोतल से अपवर्तन और क्रांतिक कोण, सिरिंज से बॉयल का नियम, बैलून रॉकेट से न्यूटन के नियम, कागज से माइक्रोस्कोप और प्लास्टिक डिब्बे में मृगमरीचिका जैसे प्रयोगों ने प्रतिभागियों को यह महसूस कराया कि विज्ञान हमारे आसपास हर क्षण उपस्थित है।
“साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी” द्वारा डॉ. वर्मा के 75वें जन्मवर्ष के अवसर पर आयोजित की गई। जिसमें कुमाऊं मण्डल के संयोजक भवानी शंकर कांडपाल, हेमंत उपाध्याय, भुवन मेलकानी, अनुभव अवस्थी, विनोद कुमार जोशी, त्रिभुवन जोशी तथा मोहित शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
इसका मूल उद्देश्य था — विज्ञान को समाज की सेवा से जोड़ना।
डॉ. वर्मा वर्षों तक आईआईटी कानपुर में अध्यापन करने के बाद वर्तमान में कानपुर स्थित “सोपान आश्रम” में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित बच्चों की शिक्षा के लिए कार्य कर रहे हैं। आईआईटी के शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर इस पहल के माध्यम से प्रतिभाशाली बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं।

उनकी पूरी यात्रा में कहीं भी औपचारिकता या ‘विशिष्ट अतिथि संस्कृति’ दिखाई नहीं दी। वे बच्चों के बीच जमीन पर बैठकर संवाद करते, प्रयोग स्वयं करके दिखाते और शिक्षकों से खुलकर चर्चा करते नजर आए।
दिनेशपुर से सल्ट तक विज्ञान संवाद की श्रृंखला
12 मई को भास्कर उप्रेती की पहल पर जिला संस्थान, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन दिनेशपुर, ऊधम सिंह नगर से आरंभ हुई यह यात्रा हल्द्वानी, नैनीताल, भीमताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर और सल्ट जैसे पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुँची।
हल्द्वानी में आयोजित कार्यशाला में शिक्षकों ने विज्ञान शिक्षण की चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर चर्चा की। डॉ. वर्मा ने कहा कि यदि विद्यार्थी विज्ञान को केवल याद करते हैं और उसे महसूस नहीं करते, तो शिक्षा अधूरी रह जाती है। विशन सिंह मेहता के आमंत्रण पर शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल में लगभग एक हजार विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने बच्चों को प्रश्न पूछने और असफल प्रयोगों से सीखने के लिए प्रेरित किया।
भीमताल और बागेश्वर के सत्र पूर्णतः गतिविधि आधारित रहे, जहाँ शिक्षकों ने स्वयं प्रयोग तैयार किए और उनके पीछे छिपे सिद्धांतों को समझा।
दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्र सल्ट में आयोजित कार्यक्रम इस यात्रा का सबसे भावनात्मक पड़ाव बन गया, जहाँ सीमित संसाधनों के बीच बच्चों का विज्ञान के प्रति उत्साह देखने योग्य था।
विज्ञान के साथ पर्यावरण और श्रम का संदेश
इस विज्ञान यात्रा की एक विशेष पहचान उसका सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश भी रहा।
अल्मोड़ा और बागेश्वर की कार्यशालाओं में प्लास्टिक और डिस्पोजेबल सामग्री पर पूर्ण प्रतिबंध रखा गया। सभी प्रतिभागियों और अतिथियों ने अपने बर्तन स्वयं साफ किए।
यह केवल एक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि श्रम के सम्मान, पर्यावरण संरक्षण और वीआईपी संस्कृति के विरोध का व्यवहारिक संदेश था। डॉ. वर्मा की सादगी से प्रभावित होकर इन संस्थानों ने भविष्य में भी एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने का संकल्प लिया।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना को जीवंत करती पहल यह पूरी विज्ञान यात्रा विज्ञान के उद्देश्यों तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की उस अवधारणा को जीवंत करती दिखाई दी जिसमें अनुभवात्मक, कौशल आधारित और जिज्ञासा-प्रेरित शिक्षा पर बल दिया गया है।

आज जबकि अधिकांश विद्यालयों में प्रयोगशालाएँ केवल औपचारिकता बनती जा रही हैं, डॉ. वर्मा ने यह सिद्ध किया कि विज्ञान शिक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपकरण महंगी मशीनें नहीं, बल्कि जिज्ञासु मन और रचनात्मक शिक्षक हैं।
यात्रा का समापन देहरादून में आयोजित छह दिवसीय राष्ट्रीय आवासीय कार्यशाला “नेशनल वर्कशॉप फॉर उत्साही फिजिक्स टीचर्स 2026” के साथ होगा जिसमें देशभर से चयनित 50 भौतिक विज्ञान शिक्षक भाग ले रहे हैं, जहाँ सरल प्रयोगों के माध्यम से भौतिकी की जटिल अवधारणाओं पर गहन चर्चा होगी।
सोपान आश्रम कानपुर द्वारा आयोजित यह 23वीं राष्ट्रीय कार्यशाला विज्ञान शिक्षण को नई दिशा देने की महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
विज्ञान का भविष्य प्रयोगों में है। डॉ. एच.सी. वर्मा की यह यात्रा केवल उत्तराखंड की यात्रा नहीं थी; यह भारतीय विज्ञान शिक्षा के भविष्य की यात्रा थी।
यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं या प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित विषय नहीं, बल्कि समाज को सोचने, समझने और बदलने की शक्ति देने वाला माध्यम है। जब बच्चे अपनी आँखों के सामने किसी साधारण बोतल में प्रकाश का अपवर्तन देखते हैं, जब शिक्षक स्वयं प्रयोग बनाकर सिद्धांत समझते हैं और जब विज्ञान समाज एवं पर्यावरण से जुड़ता है — तभी वास्तविक वैज्ञानिक चेतना जन्म लेती है।
उत्तराखंड की पहाड़ियों में बहती यह “प्रयोग-यात्रा सरिता” आने वाले वर्षों में विज्ञान शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणा की स्थायी धारा बन सकती है।
