दी टॉप टेन न्यूज़/ देहरादून
पौड़ी गढ़वाल : जनपद पौड़ी गढ़वाल के विकासखंड कोट अंतर्गत ग्राम पंचायत बालमणा में दिनांक 23 दिसंबर 2025 को आयोजित तथाकथित खुली बैठक को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। स्थानीय निवासी एवं सेवानिवृत्त सहायक कमांडेंट बीएसएफ रवींद्र प्रसाद जुयाल ने बैठक को उत्तराखण्ड पंचायती राज अधिनियम, 2016 का घोर उल्लंघन बताते हुए उसे अवैध करार दिया है और प्रशासन को प्री-लिटिगेशन नोटिस जारी किया है।
जुयाल के अनुसार यह बैठक वर्ष 2026–27 की कार्ययोजना तैयार करने के नाम पर आयोजित की गई, लेकिन इसमें न तो संबंधित विभागों—कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, समाज कल्याण—के अधिकारियों की अनिवार्य उपस्थिति थी और न ही ग्राम पंचायत का विधिवत गठन। उन्होंने कहा कि बिना विभागीय अधिकारियों के कार्ययोजना बनाना कानूनन और व्यवहारिक दोनों रूप से अर्थहीन है।
उन्होंने बताया कि ग्राम पंचायत के कुल पांच निर्वाचित सदस्यों में से केवल दो सदस्य ही बैठक में उपस्थित थे, जबकि शेष सदस्य स्थायी रूप से ग्राम से बाहर निवासरत हैं। इतना ही नहीं, इन सदस्यों ने अनिवार्य क्षमता विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम में भी भाग नहीं लिया। ऐसे में बैठक कराना पंचायती राज अधिनियम की धारा 138 का सीधा उल्लंघन है।
विवाद का एक प्रमुख बिंदु यह भी है कि बैठक से पूर्व उप-प्रधान का निर्वाचन नहीं कराया गया, जबकि अधिनियम की धारा 10-क के तहत यह ग्राम पंचायत के विधिवत गठन के लिए अनिवार्य शर्त है। आरोप है कि ग्राम पंचायत विकास अधिकारी ने उप-प्रधान के निर्वाचन को लेकर गलत जानकारी देते हुए कहा कि इसके लिए “ऊपर से नोटिफिकेशन” आएगा, जबकि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
इसके अतिरिक्त बैठक में एक अयोग्य व्यक्ति को क्षेत्र पंचायत सदस्य के रूप में शामिल किए जाने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायत के अनुसार यह व्यक्ति निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं था, बल्कि एक निर्वाचित महिला सदस्य का परिजन था, जो स्वयं ग्राम क्षेत्र में निवासरत भी नहीं हैं। इसे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की मूल भावना के विपरीत बताया गया है।
एक अन्य गंभीर आरोप यह है कि ग्राम पंचायत की एक वार्ड सदस्य द्वारा सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक/जीवन बीमा निगम से संबद्ध पद पर कार्यरत रहते हुए पंचायत सदस्य बने रहना, अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत अयोग्यता की श्रेणी में आता है।
जुयाल ने कहा कि ग्राम सभा द्वारा लिखित रूप में दिए गए प्रस्तावों को भी स्वीकार नहीं किया गया, जो ग्राम सभा की सर्वोच्चता के सिद्धांत का उल्लंघन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन द्वारा शीघ्र ही बैठक को निरस्त कर ग्राम पंचायत का विधिसम्मत गठन सुनिश्चित नहीं किया गया, तो वे माननीय उच्च न्यायालय उत्तराखण्ड में रिट याचिका दायर करने के लिए बाध्य होंगे।
मामले ने अब राज्य स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
