दी टॉप टेन न्यूज़ देहरादून
देहरादून-साल 2009 में देहरादून में हुए बहुचर्चित ओर फर्जी रणबीर सिंह एनकाउंटर केस में दोषी पाए गए पांच पुलिसकर्मियों को शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय से जमानत मिल गई है। जमानत मिलने वालों में इंस्पेक्टर संतोष कुमार जायसवाल, दारोगा नितिन चौहान, नीरज यादव, जीडी भट्ट और कांस्टेबल अजीत शामिल हैं। और इन्हें उत्तराखंड पुलिस से बर्खास्त कर दिया गया था। इस मामले में अभी तक दोषी पाए गए पुलिसकर्मी 11 साल से ज्यादा का समय जेल में बिता चुके हैं इस केस में हाईकोर्ट ने 2018 में सात पुलिसकर्मियों को दोषी पाते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई थी जिनमें राजेश बिष्ट और चंद्रमोहन को पहले जमानत मिल गई है लेकिन इन 5 पुलिसकर्मियों की अपील 2019 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित चल रही थी हालांकि निचली अदालत ने इस मामले में 17 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया था लेकिन हाईकोर्ट ने 10 पुलिसकर्मियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था।
ये था फर्जी रणवीर सिंह एनकाउन्टर केस
देहरादून में तीन जुलाई 2009 को गाजियाबाद निवासी रणबीर सिंह का पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर किया था। रणबीर एमबीए का छात्र था। उसके शरीर पर गोलियों के दो दर्जन से अधिक निशान मिले थे। पुलिस का कहना था कि रणबीर पर उन्हें वसूली गिरोह के सदस्य होने का संदेह था और उसने तत्कालीन चौकी प्रभारी आराघर जेडी भट्ट की सर्विस रिवाल्वर लूटने का प्रयास किया था। इसीलिए उसका एनकाउंटर करना पड़ा।
हालांकि, न्यायालय में पुलिस की कहानी फर्जी साबित हुई। वर्ष 2014 में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने इस मामले में उत्तराखंड के 17 पुलिसकर्मियों को हत्या, अपहरण, सुबूत मिटाने, आपराधिक साजिश रचने और गलत सरकारी रिकार्ड तैयार करने का दोषी करार दिया था।
घटना वाले दिन रणबीर सिंह नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गाजियाबाद से देहरादून आया था। यहां किसी बात को लेकर उसकी कुछ पुलिसकर्मियों से मामूली कहासुनी हो गई। इस पर पुलिस ने उसे बदमाश बताकर मार डाला और घटना को एनकाउंटर करार दे दिया।
इसके लिए पुलिसकर्मियों को सम्मानित भी किया गया था। बाद में रणबीर के परिवार की मांग पर मामले की सीबीआइ जांच हुई, तब फर्जी एनकाउंटर से पर्दा उठा। जांच में पता चला कि उत्तराखंड पुलिस ने मामूली कहासुनी पर ये एनकाउंटर कर दिया था।
