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निकहत जरीन विश्व बॉक्सिंग चैंपियन,52 किलोग्राम भार वर्ग में जीता गोल्ड

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दी टॉप टेंन न्यूज

वर्ल्ड बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में भारत की निकहत जरीन ने इतिहास रच दिया है. गुरुवार को हुए फाइनल मुकाबले में निकहत जरीन ने जीत दर्ज कर गोल्ड मेडल अपने नाम किया है. 52 किग्रा. कैटेगरी में निकहत जरीन ने थाईलैंड की जिटपॉन्ग जुटामस को 5-0 से मात देकर जीत दर्ज की।

पूरी फाइट के दौरान निकहत जरीन का दबदबा देखने को मिला, उन्होंने अपने बाउट की शुरुआत ही विरोधी बॉक्सर को राइट हैंड से जैब मारते हुए की थी. निकहत जरीन लगातार इस टूर्नामेंट में छाई रहीं, पहले सेमीफाइनल में उन्होंने 5-0 से जीत दर्ज की, जिसके आखिरी चार राउंड में सभी जजों ने उनके हक में ही फैसला सुनाया था. अब फाइनल में भी ऐसा ही दबदबा देखने को मिला।

निकहत जरीन ने पिछले कुछ वक्त में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन किया है. 2019 की एशियन चैम्पियनशिप में भी निकहत जरीन ने ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया था. जबकि इसी टूर्नामेंट के सेमीफाइनल मैच में उन्होंने ब्राजील की कैरोलिन डे अल्मीडा को 5-0 से मात दी थी।

25 साल की निकहत जरीन पांचवीं भारतीय महिला बॉक्सर हैं, जिन्होंने वर्ल्ड बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल अपने नाम किया है. बॉक्सिंग लीजेंड मैरीकॉम ने इस चैम्पियनशिप में 6 बार गोल्ड मेडल जीतकर रिकॉर्ड बनाया है. भारत की ओर से वर्ल्ड बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में एमसी मैरीकॉम, सरिता देवी, जेनी आरएल और लेखा सी. गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं. अब इस लिस्ट में युवा बॉक्सर निकहत जरीन का भी नाम जुड़ गया है।

निकहत जरीन ने हाल ही में Strandja Memorial में मेडल जीता था, वह यहां दो गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय बनी थीं. यहां उन्होंने टोक्यो ओलंपिक की सिल्वर मेडलिस्ट को मात दी थी, अब वर्ल्ड चैम्पियन बनने के बाद निकहत जरीन से उम्मीदें बढ़ गई हैं. ऐसे में अब निगाहें सीधा पेरिस ओलंपिक पर टिकी हैं।

जीत का उत्तराखंड से क्या है संबंध

इसमें खास बात यह है कि इस टीम के मुख्य और सहायक कोच दोनों ही उत्तराखंड के हैं। उत्तराखंड बॉक्सिंग संघ के महासचिव गोपाल सिंह खोलिया ने कहा प्रतियोगिता 8 से 21 मई तक आयोजित हो रही है। इसमें भारत की महिला मुक्केबाज 13 भार वर्गों में अपने जौहर दिखाएंगी। उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जिले के भाष्कर भट्ट महिला मुक्केबाज टीम के मुख्य प्रशिक्षक हैं। हल्द्वानी निवासी सहायक प्रशिक्षक मुकेश बेलवाल भी खिलाड़यों को दांव-पेंच सिखाने में मदद कर रहे हैं। कोच भाष्कर ने दूरभाष पर बताया कि महिला मुक्केबाजी टीम ने प्रतियोगिता से पूर्व 15 दिनों के प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लिया है। ‘विश्व की अलग-अलग टीमों के साथ भी अभ्यास किया।

निकहत जरीन का संघर्ष लाया रंग

निकहत जरीन के लिए बॉक्सिंग की दुनिया में 12 साल का एक अविश्वसनीय सफर रहा है। अब इस्तांबुल (तुर्की) में महिला विश्व चैंपियनशिप में उनके शानदार प्रदर्शन के बाद, उनके और उनके गौरवान्वित परिवार के पास गर्व की भावना के साथ पीछे मुड़कर देखने का हर कारण है।

यह एक सफलता की कहानी थी जहां एक रूढ़िवादी परिवार की एक सामान्य मध्यवर्गीय लड़की ने भारतीय खेल में अपनी प्रसिद्धि की जगह बनाने के लिए नियमित स्क्रिप्ट और सभी बाधाओं को तोड़ दिया।

आश्चर्य नहीं कि निकहत ने हमेशा अपने माता-पिता – पिता मोहम्मद जमील अहमद, जो घर वापस जाने से पहले खाड़ी में एक बिक्री अधिकारी थे, और माँ परवीन सुल्ताना – से चलते रहने के लिए उस तरह के समर्थन पर जोर दिया है। चार बहनों में तीसरी होने के नाते, निकहत के लिए नए मोर्चे तलाशना और भी चुनौतीपूर्ण था।

उनके करियर का निर्णायक क्षण वह था जब निजामाबाद (तेलंगाना) में मुक्केबाजों को प्रशिक्षित करने वाले शमसुद्दीन ने महसूस किया कि निकहत को न केवल अपने रवैये, हिम्मत और धैर्य के कारण बल्कि उस साधारण तथ्य के लिए भी मुक्केबाजी करनी चाहिए जो उन्हें लगता है कि उसने किया था। महिला बॉक्सिंग में बड़ा करने का एक बेहतर मौका।

एक बार के लिए, निकहत 13 साल की उम्र में बॉक्सिंग में शामिल हो गई और छह महीने के भीतर, उसने 2010 में करीमनगर में स्टेट चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक जीता और स्वर्ण पदक जीतकर पंजाब में ग्रामीण नागरिकों के लिए चुनी गई।

तीन महीने के भीतर, निकहत को इरोड (तमिलनाडु) में सब-जूनियर नागरिकों में जीते गए स्वर्ण के अलावा ‘सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज’ चुना गया। जल्द ही, निकहत द्रोणाचार्य प्रथम वेंकटेश्वर राव के संरक्षण में विशाखापत्तनम में भारतीय खेल प्राधिकरण शिविर में शामिल हो गए।

आठ महीने के प्रशिक्षण के बाद, उसका अद्भुत प्रदर्शन जारी रहा क्योंकि उसने अंतालय में लड़कियों के लिए 2011 विश्व जूनियर और युवा चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था।

निकहत के परिवार ने यह भी याद किया कि 2014 में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव द्वारा सौंपे गए 50 लाख नकद प्रोत्साहन एक बहुत बड़ी मदद थी। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने के बावजूद उसके बाद कुछ भी ऑफर नहीं किया गया।

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