*देहरादून* : उत्तराखण्ड राज्य के गठन को सत्रह सालो से भी अधिक का समय हो चुका है। लेकिन राज्य गठन की परिकल्पना के अनुरूप आज भी पहाड़ के विकास नही हो पाया। जिसके फलस्वरूप पहाड़ से आज भी पलायन जारी है।पलायन का दंश आज भी जंहा देवभूमि झेलने को मजबूर है लेकिन राज्य पर काबिज सरकारें पहाड़ से पलायन की रोकथाम को लेकर कोई ठोस रणनीति धरातल पर उतारने में आज तक विफल रही है। हमे इन सत्रह सालो में आठ मुख्यमंत्री तो जरूर मिले लेकिन पहाड़ के पलायन की पीड़ा पर मरहम लगाने में कोई भी सरकार अभी तक सफल नही हो पाई।
राज्य में पलायन की अगर बात की जाए तो वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार सूबे 2.85 लाख घरों में ताले लटके हुए है। वही लगभग 968 गांव घोस्ट विलेज बन चुके है जिनमे फिलहाल कोई नही रहता है।वही राज्य में लगभग 2000 गांव ऐसे है जिनके बन्द घरों के दरवाजे पूजा या खास मौकों पर ही खुलते है।
वही अगर पिछले सात वर्षों की बात की जाए तो पर्वतीय जिलों में 700 से ज्यादा गांव खाली हो चुके है। जबकि पिछले 10 वर्षों में राज्य के 3.83 लाख से अधिक लोगो ने पलायन के चलते अपना घर छोड़ दिया है।राज्य में 50 फीसद लोग जंहा आजीविका की तलाश में पलायन को मजबूर हुए है। तो वही 73 फीसद बेहतर शिक्षा के उद्देश्य तो 10 फीसद स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में पहाड़ छोड़ने को मजबूर हुए है। इन सभी बातों की तस्दीक राज्य पलायन की रिपोर्ट भी करती है।
राज्य पलायन की रिपोर्ट पर अगर गौर करे तो राज्य के पांच पहाड़ी जिलों की पलायन को लेकर स्थिति चिंता जनक है। उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग,टिहरी,पौड़ी,अल्मोड़ा व पिथौरागढ़ जनपदों में पलायन की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक रूप में सामने आई है।राज्य गठन के बाद अभी तक जंहा 70 फीसद लोगो ने राज्य के अंदर ही पलायन किया है। तो वही 29 फीसद लोग राज्य को छोड़ कर अन्य प्रदेशों में पलायन कर चुके है। साथ ही मात्र एक फीसद लोग उत्तराखण्ड से विदेशों में जाकर बस चुके है।
राज्य में लगातार भयावह होती पलायन की तस्वीर सत्तासीनों को भी सोचने और मजबूर कर सकती है। क्योंकि उत्तराखण्ड में आज भी गांव जंहा सड़क सुविधा से वंचित है तो लगातार पलायन से खाली होते पहाड़ो में स्थापित लगभग 2344 प्राथमिक व जूनियर हाईस्कूल बंदी की कगार में पहुँच चुके है।
उत्तराखण्ड में जनपद वार खाली घरों के आकड़ो की अगर बात की जाए तो अल्मोड़ा जिले में 36401, पौड़ी में 35654, टिहरी में 33689, पिथौरागढ़ में 22936, देहरादून में 20625, चमोली में 18 535, नैनीताल में 15075, उत्तरकाशी में 11710, चम्पावत में 11281, रुद्रप्रयाग में 10970 तो बागेश्वर जनपद में 10073 घर पलायन के चलते खाली पड़े है। राज्य गठन के बाद पलायन भयानक होती तस्वीर पर अगर गौर करे तो उत्तराखण्ड में कुल 7555 ग्राम पंचायते है।जिनमे कुल 16793 गांवो की संख्या है।जिनमे से वर्तमान में 3000 गांव अभी तक पलायन के चलते खाली हो चुके है। लगभग 3200000 लोग रोजगार, शिक्षा,बेहतर शिक्षा व मूलभूत सुविधाओं की चाहत में पहाड़ छोड़ चुके है।प्रदेश के 280000 घरों पर ताले लटके होने की वजह से वो वीरान पड़े है।
पलायन से सिर्फ राज्य के पर्वतीय जिले ही खाली नही हो रहे है वरन राज्य की कई हेक्टयर कृषि भूमि भी बंजर होती जा रही है। अगर आकड़ो पर बात की जाए तो उत्तराखण्ड राज्य में पलायन की मार कृषि भूमि पर भी पड़ी है। प्रदेश की 70 हेक्टेयर कृषि भूमि पलायन के चलते बंजर में तब्दील हो चुकी है। सूबे में बंजर भूमि का रकबा लगभग एक लाख हेक्टेयर से भी अधिक पहुँच चुका है।
पृथक उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई इन्ही परिकल्पनाओं को लेकर लड़ी गई थी कि राज्य गठन के बाद पर्वतीय जनता को बेहतर मूलभूत सुविधाएं रोजगार,बेहतर स्वास्थ्य, व शिक्षा का लाभ मिल पायेगा। पहाड़ के पानी व जवानी का सही सदुपयोग होगा। जिससे पर्वतीय प्रदेश में पलायन की पीड़ा कम होगी।लेकिन राज्य गठन के सत्रह सालो बाद भी तमाम सत्तासीन सरकारें व प्रदेश के हुक्मरान राज्य के पलायन की पीड़ा को कम करने में नाकाम रहे। जिससे पलायन का आंकड़ा उत्तराखण्ड में वर्ष दर वर्ष कम होने की जगह बढ़ता ही गया।
राज्य निर्माण के बाद प्रदेश के तराई जनपद उधम सिंह नगर,हरिद्वार व देहरादून में तो सिडकुल की स्थापना के साथ उधोग स्थापित हुए लेकिन पर्वतीय जनपदों में सरकारें उधोगों की स्थापना में नाकाम रही जिससे पर्वतीय जिलों में रोजगार के अवसर पैदा नही हो पाए। वही पर्वतीय क्षेत्रों के कुटीर व लघु उधोग उचित प्रोत्साहन ना मिलने व प्रतिस्पर्धा में नही टिकने के चलते बन्द हो गए। राज्य में काबिज सरकारों को चाहिए था कि राज्य में पलायन की मूल वजहों पर जाकर उस पर विशेष फोकस किया जाता। राज्य के पर्वतीय जिलों कृषि, सहकारिता,उद्यान,डेयरी,पशुपालन ,ग्राम विकास पर सरकार विशेष ध्यान देने के साथ रोजगार के अवसर पैदा करें।साथ ही पहाड़ के लोगो को बेहतर शिक्षा,उत्तम स्वास्थ्य सुविधाएं व सड़क परिवहन की सुविधाएं मुहैया कराई जाए। जिससे पलायन की रोकथाम सरकार को मदद मिल सकती है।
राज्य के युवा राज्य सभा सांसद अनिल बलूनी ने वर्तमान में जरूर पलायन से खाली होते पर्वतीय जिलों पर चिंता व्यक्त की है। साथ ही पौड़ी जनपद दुगट्टा ब्लॉक के गैर आबाद गांव बौर को पायलट प्रोजेक्ट के तहत गोद ले एक साल में मूलभूत सुविधाओं से संपन्न कर उसे आबाद करने की योजना बनाई है। इसी तरह राज्य के सभी सांसद, विधायक व जिलाधिकारी पहाड़ो के वीरान हो चुके गांवो को गोद ले उन्हें आबाद करने का इच्छा शक्ति के साथ बीड़ा उठाये तो निश्चित ही पहाड़ के वीरान गांव कुछ ही सालो में आबाद हो सकते है। बस राज्य की सरकारों को दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ पलायन की रोकथाम पर सिद्दत के साथ काम करने की आवश्यकता है। अगर वक्त रहते राज्य के हुक्मरान नही चेते तो वो दिन दूर नही की पलायन के दंश से पहाड़ के पर्वतीय जिले बिलकुल वीरान हो जाये। इसलिए राज्य सरकार को पलायन रोकथाम व पर्वतीय जिलों के उत्थान को ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है। तभी पर्वतीय प्रदेश की सच्ची परिकल्पना साकार हो पाएगी।

