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मुस्लिम समुदाय ने सादगी से मनाया ईद का त्यौहार

जरूरतमंद लोगों को बतौर ईदी तोहफे में दिए मास्क सैनिटाइजर और राशन

नीता कांडपाल

दी टॉप टेन न्यूज़ देहरादून

मुस्लिम समुदाय का ईद का त्यौहार सबसे बड़ा त्यौहार होता है पवित्र रमजान माह में 30 दिन रोजा रखने के बाद ईद का चांद दिखाई देते हैं तब रोजेदार यह त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाते हैं और देश भर की हर मस्जिद ईदगाह में रौनक देखने लायक होती है।

लेकिन इस बार कोविड-19 की वजह से मस्जिदे और ईदगाह सुनसान ही दिखाई दी इस बार कोरोनावायरस को फैलने से बचाव के लिए मुस्लिम समुदाय ने ईद की नमाज घरों पर ही अता की और एक दूसरे से गले मिलकर ईद की बधाई देने की जगह एक नई परंपरा की शुरुआत करते हुए अपने दिल पर हाथ रख कर एक दूसरे को ईद की दुआएं दी।

समुदाय में यह रिवाज होता है कि नए कपड़े पहन कर ईद की नमाज अता की जाती है लेकिन इस बार इस समुदाय ने स्वयं के लिए नए कपड़े ना बनाकर जरूरतमंद लोगों को राशन  मास्क सैनिटाइजर और जरूरत का सामान  ईदी के तौर पर बतौर तोहफे में दिया।

देहरादून में पुलिस और प्रशासन द्वारा की गई अपील रंग लाई

लॉक डाउन में सोमवार को ईद उल फितर के त्यौहार पर पुलिस प्रशासन की अपील भी कारगर साबित हुई और मुस्लिम समुदाय ने लॉक डाउन का पालन करते हुए अपने-अपने घरों से ही सुबह ईद की नमाज अता की।

डीएलएसए की सचिव नेहा कुशवाहा ने भी रमजान माह में कई बार की थी अपील

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव जज सीनियर डिवीजन नेहा कुशवाहा ने भी रमजान माह में कई बार मुस्लिम समुदाय से अपील की और कहा कि अल्लाह हर जगह मौजूद रहते हैं इसलिए कृपया लॉक डाउन का पालन करें और स्वयं की और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए अपने अपने घरों से ही नमाज अता करें। आज ईद के अवसर पर जज नेहा कुशवाहा ने देहरादून वासियों के साथ साथ पूरे प्रदेश के निवासियों को ईद की शुभकामनाएं दी।

ईद के मौके पर लॉ की छात्रा और पीएलवी नजमा परवीन ने कुछ इस तरह बया की ईद की रौनक

आज ईद है पर ईद की मिठास न जाने कहां गुम सी हो गई.. जिनसे गले मिलते थे आज वो रुखसत सी हो गई..आज अपने पास न सही पर आस तो है की ईद वो भी बना रहे होंगे…..घरो में अपने इबादत करके शीर वो भी खा रहे होंगे। वैसे तो ईद गले मिलने का त्यौहार है  पर इस साल ईद पर लोगो के गले नहीं दिल मिले । लोग एक दूसरे की मदद कर रहे हैं और यही हमारे भारत की संपूर्ण पहचान है। नमाज़ भी अदा की पर तनहा-तनहा, वैसे तो घर में सिवैया भी बनी पर हर साल जैसी मिठास ना थी क्योंकि वह साथ मिलकर नहीं खाई गई। चहल-पहल जो रहा करती थी आज वह कम है…..क्योंकि हवा में जहर और अपनों से ना मिलने का गम है… बाजार तो खुले थे पर रौनक ना थी , एक सुकून था कि अपने नए कपड़े ना बनाकर दूसरों की मदद की है दूसरों के घर में अन्न पहुंचाया है। इस साल ईद पर अपने घर में नए सामान ना खरीद कर दूसरों को उनके परिवारों तक पहुंचाया है। उस पैसे से उनको खुशियां दी है दूर दूर से ही सही पर ईद तो मनाई है अपनों के साथ अपने भारत  में। हमने ठाना था कि इस ईद पर बाहर न निकलेंगे पर ठीक-ठाक रहे तो फिर मिल लेंगे।

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